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विद्यामंत्र: दुर्लभ वस्तु सौभाग्य से प्राप्त होती है, जबकि दुर्भाग्य होने पर नशीली वस्तु मिल जाती है


जबलपुर। दयोदय तीर्थ तिलवारा में आचार्य श्री विद्यसागर जी महाराज ने कहा कि दुर्लभ वस्तु भाग्य से मिलती लेकिन नशीली वस्तु जब भाग्य फूटता है तब मिलती है। अज्ञानी और ज्ञानी दोनों है। एक के पास सभी भौतिक विषयों का भंडार लगा है उसके बाद भी वह उसे बढ़ाना ही चाहता है और दूसरा भी आनंद लेना चाहता है। धन के मद में वह उस दशा में वह चला जाता है जहाँ से लौटना कठिन है। नशा करने लगता है विषय उसके सामने से गायब हो जाते हैं, इसी को वह सुखचैन आदि मान करके जब तक वह नशा नहीं कर लेता तब तक परेशान रहता है। उसमें वह डूबा रहता है मूर्छित सा रहता है । एक प्रकार से बेहोश अवस्था में चला जाता है। जिस तरह दवाई देकर रोगी को बेहोश किया जाता है, लेकिन जो डाक्टर बेहोश करने की दवा देता है वह पूरे होश हवास में उसकी रक्षा करता है। हर युग मे युगपुरुष आते हैं वह बेहोश लोगों को होश में लाने का प्रयास करते हैं ।

आचार्य श्री कहते है नशीली दवाओं की कीमत इतनी अधिक होती है उसके सामने सोना चांदी और हीरा भी कम मूल्यवान लगते हैं। उसके मूल्य सुनकर ही समझ में आ जाता है कि अज्ञानी की दिशा और दशा क्या होती है। सुनते हैं कि नशीली पदार्थों का अभी खरबो रुपये मूल्य है और वह अब नशा भारत वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इतनी संपदा से यदि देश हित में काम किया जाए धरती हमेशा हमेशा स्वर्ग के समान हो जाए लेकिन यह होता नहीं है। देश के युवा नशे से बेहोशी में जा रहा है। हजारों युवा तो इसके जाल में फंसते जाते हैं। कितने यह गलत काम करने वाले पकड़ में आते हैं कितने नहीं आते, चोर चोरी करता है फिर भी साहूकार कहलाना चाहता है। पकड़ में आ गए तो चोर नहीं तो साहूकार बनकर रहते हैं। वहीं पर योगी - ज्ञानी ऐसी अवस्था में पहुंच जाते हैं जब, शरीर को लकड़ी की भांति बना देता है। ज्ञानी अज्ञानी दोनों इस युग में जी रहे हैं किंतु अलौकिक आनंद का अनुभव योगी - ज्ञानी कर लेता है ।

सब कुछ पा करके भी अज्ञानी भोगी विलासी हो और यदि वह नशे में डूबा रह कर सुख पाने का स्वप्न भी देखता है तो उससे ज्यादा दुर्भाग्यशाली कोई नहीं होता, जबकि ज्ञानी पुरुष वहीं रह करके ज्ञान- धर्म के चिरागों से रोशनी फैलाते हैं और ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं जहाँ बाहरी जगत से संबंध भी टूट सा जाता है। वे अपने ऊपर रोक लगाए रहते हैं। दुर्लभ वस्तु भाग्य के बिना नहीं मिलती लेकिन नशीली वस्तु जब भाग्य फूटता है तब मिलती है या कहें अपने आप मिल जाती है। धन कभी-कभी अभिशाप सा होता है। इस युग में हम देख सकते हैं व्यक्ति अतिरेक धन के कारण अनेक प्रकार की चिंताओं में लगा रहता है। सोचनीय है कि, नशीले पदार्थ के आने जाने के लिए जो मार्ग हैं, जो वाहन है उन्हें उन्हें छूट क्यों दी गई है ,यह भी एक चिंता का विषय है। तभी नशीला पदार्थ आता है और छुपाया जाता है। राष्ट्रीय दृष्टि से भी यह बहुत बड़ा अपराध माना जाता है। 

आचार्य श्री कहते है, वस्तु स्वरूप को समझने वाला भगवान शिव की भक्ति में अपने आप का दर्शन करता है और वासना का दास व्यक्ति शव की भांति चरण में पड़ा रहता है ,शव तो शव है छूने लायक नहीं है और शिव तो शिव है अहोभाग्य मानकर उसके चरणों में समाया जाता है। आप लोगों ने 10 लक्षण धर्म के माध्यम से समझना चाहिए जितना अर्थ आपके पास संग्रहित होगा उतना पाप का बंध आपके पास संगठित हो रहा है, या यह विश्वास करके चलना चाहिए जब आप ने बिना उपयोग किये भी यदि धन रखा है तो भी पाप का बंध हो रहा है । जबकि वह धन यदि सदकार्यों में और जन सेवा के कार्यों में लगाया जाता है वह पुण्य का फल देता है । ज्ञानी अपने कमाए गए प्रत्येक धन का उपयोग सदकार्यों में भी करता है जबकि अज्ञानी उसे संग्रह कर पाप का भागी बनता है, ज्ञानी व्यक्ति धन को अपने काम में भी उपयोग करता है और दूसरों के काम में भी उपयोग करता है, तभी धन की सार्थकता है। 
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