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विद्यामंत्र: जीवन में अनुशासन और संयम बेहद आवश्यक है


जबलपुर। दयोदय तीर्थ में शुक्रवार को आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने कहा कि मनुष्य के पास ही संयम है। लोग शारीरिक कष्ट होने पर डॉक्टर के पास चिकित्सा हेतु जाते हैं परीक्षण- निदान होने के पश्चात वह बताता है कि आपको क्या रोग हुआ है। उसको दूर करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यकता है। आपको नियम पालन करना आवश्यक है तभी आपका रोग ठीक होगा। पको सुनकर ही अच्छा लगेगा कि मैं ठीक हो सकता हूं। लेकिन आपको ठीक होने के लिए नियम एवं तरीका अपनाना पड़ेगा। रोगी अपने कार्यों से और इच्छाशक्ति से ठीक होगा।

यदि व्यक्ति का मन ठीक है प्रसन्न है तो वह जल्दी ठीक होगा। यदि मन ठीक नहीं है चिंता है तो व्यक्ति जल्दी ठीक नहीं होगा। चिकित्सक सदैव अपने रोगी को ठीक होने की दिलासा देता है। रोग एवं कष्ट जल्दी दूर होगा आप जल्दी स्वस्थ होंगे। आप बहुत जल्दी करोगे तो संभव है दवाई व्यर्थ चली जाएगी। जब हमें बहुत अधिक कष्ट होता है उस समय भी यदि आप अपने चित्त को शांत रखते हैं तो अवश्य ही आप का उपचार सही होगा। भारी वेदना होने पर आपको चिकित्सक इंजेक्शन देते हैं। उसके नशे से आप तात्कालिक रूप से चेतना शून्य हो जाते हैं लेकिन बाद में यह आपको बहुत कष्ट देता है। इसीलिए बेहोश करना या मूर्छा अवस्था कभी भी ठीक नहीं है। इससे शक्ति क्षीण हो जाती है।

उन्होंने कहा कि एक कहावत है कि कम खाओ गम खाओ। गम का अर्थ होता है संयम रखना है। इसलिए कहा जाता है की भोजन ही उपचार है। यदि कम खाया जाए तो बहुत से रोगों को समाप्त किया जा सकता है। एक बहुत पुरानी बुंदेलखंडी कहावत है। क्वांर करेला कार्तिक दही मर हो ना तो पर हो सही। यानी कि क्वांर मास में करेला और कार्तिक मास में दही खा लिया तो आपके शरीर में नुकसान अवश्य करेगा। इसलिए कहा जाता है कि खाने पीने में नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। आज आयुर्वेदाचार्य कहते हैं कि भले पित्त उछले लेकिन चित् शांत रहना चाहिए।

आचार्य श्री कहते हैं कि चिकित्सकीय उपचार प्राप्त करने के लिए हमें अपना संयम बनाए रखना चाहिए। अन्य किसी जीव के पास संयम नहीं है सिर्फ मनुष्य के पास ही संयम है। यदि मनुष्य असंयमी हो तो उस व्यक्ति के आवेश में आने से ही देश में विपत्ति आ सकती है और एक संयमी व्यक्ति समाज को शांत कर देता है। उससे देश की समाज की उन्नति हो जाती है। हम बहुत कुछ कर रहे हैं लेकिन हम राष्ट्र के लिए क्या कर रहे हैं। यह सोचना आवश्यक है। जितना बन सके उतना कर दे तो ही देश की उन्नति हो जाएगी।
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