जबलपुर में इन दिनों पुलिस महकमे का मंजर कुछ ऐसा है मानो कोई सख्त मास्साब अपनी क्लास में अनुशासन का डंडा लेकर खड़ा हो। फर्क बस इतना है कि यहां ब्लैकबोर्ड की जगह पुलिस कप्तान का दफ्तर है और छात्र हैं जिले के थाना प्रभारी।
दरअसल, हाल ही में कप्तान साहब ने जिले के 38 में से 26 थाना प्रभारियों को एक साथ निंदा की सजा दे दी। अब भला बताइए, जब पूरी क्लास के दो-तिहाई बच्चे फेल हो जाएं तो शक मास्साब की पढ़ाई पर भी जाता है। लोग मजाक में कह रहे हैं कि या तो बच्चों ने पढ़ाई नहीं की, या फिर मास्साब का रौब कुछ कम पड़ गया।
मामला यहीं नहीं थमा। खबर है कि एक थानेदार को दो दिन बाद पूरे दिन कप्तान के ऑफिस के बाहर खड़े रहने की अघोषित सजा भी मिल गई। दृश्य बिल्कुल वैसा ही रहा होगा जैसा स्कूल में होता था—गलती करो और मास्साब कह दें, “जाओ, बाहर खड़े रहो… और सोचो अपनी गलती।”
कप्तान साहब का यह नवाचार सुनकर मुझे तो अपने स्कूल के दिन याद आ गए। जब प्रमेय याद न होने पर गणित वाले संधू मास्साब पूरी क्लास के सामने बाहर खड़ा कर देते थे। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां हाथ में कॉपी-किताब होती थी और यहां वर्दी व जिम्मेदारी।
हालांकि शहर में बढ़ते अपराध, चाकूबाजी, हत्याएं और नशीले पदार्थों के कारोबार को देखते हुए अफसर का सख्त होना भी जरूरी है। अब देखना यह है कि मास्साब की यह सख्ती बच्चों को सुधारती है या फिर अगली क्लास में और भी ज्यादा “फेल” निकलते हैं। अगर इससे अपराध पर लगाम लगती है तो यह सजा नहीं, सुधार की पाठशाला साबित होगी।
