कलेक्टर पर 50 हजार का लगा जुर्माना, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी - Khabri Guru

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कलेक्टर पर 50 हजार का लगा जुर्माना, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

जबलपुर। अवैध खनन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने छिंदवाड़ा कलेक्टर के आदेश को न केवल निरस्त कर दिया, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली पर कड़ी आपत्ति जताते हुए 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा “आंख मूंदकर” लिए गए फैसले न्यायिक प्रक्रिया के साथ गंभीर अन्याय हैं।
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच में हुई, जहां कोर्ट ने पाया कि कलेक्टर द्वारा पारित आदेश बिना पर्याप्त जांच और तथ्यों के सत्यापन के जारी किया गया था।

क्या है पूरा मामला

यह प्रकरण छिंदवाड़ा जिले के चौरई क्षेत्र का है, जहां एक ट्रक को अवैध खनिज परिवहन करते हुए पकड़ा गया था। जांच के दौरान ड्राइवर ने ट्रक का मालिक सारंग रघुवंशी बताया। प्रशासन ने इसी एक मौखिक बयान को आधार बनाते हुए पूरा मामला तैयार कर लिया।
बिना किसी दस्तावेजी पुष्टि के कलेक्टर ने ट्रक को राजसात करने और जुर्माना लगाने का आदेश जारी कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से, संबंधित अधिकारियों ने वाहन के रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों की जांच तक नहीं की और न ही वास्तविक पंजीकृत मालिक बलवीर सिंह से संपर्क करने की आवश्यकता समझी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को “लापरवाह” और “यांत्रिक” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट या किसी व्यक्ति के मौखिक बयान के आधार पर निर्णय लेना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी कार्रवाई से पहले तथ्यों का गहन परीक्षण करें। इस मामले में ऐसा न होना न केवल प्रक्रिया की त्रुटि है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन है।

आदेश निरस्त, हर्जाना भी लगाया

हाईकोर्ट ने कलेक्टर द्वारा पारित आदेश को पूरी तरह निरस्त करते हुए उन पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया। यह राशि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लगाई गई है, ताकि भविष्य में इस तरह की लापरवाही न हो।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल

इस फैसले के बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि बिना ठोस साक्ष्यों के की गई कार्रवाई न केवल न्याय के विरुद्ध है, बल्कि संबंधित अधिकारियों के लिए भी दंडात्मक साबित हो सकती है।
यह फैसला आने वाले समय में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि हर निर्णय तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

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