जबलपुर में इन दिनों हालात कुछ ऐसे बन गए हैं कि आम नागरिक खुद को सुरक्षित नहीं, बल्कि असहाय महसूस करने लगे हैं। एक के बाद एक हो रही हत्याएं और हिंसक घटनाएं यह सवाल खड़ा कर रही हैं कि आखिर शहर में कानून का डर बचा भी है या नहीं?
बीते दिन सुबह 8 बजे रांझी में दिनदहाड़े गोलियों की बौछार कर युवक की हत्या कर दी जाती है। पाटन में रात के अंधेरे में लाठी-डंडों से पीट-पीटकर जान ले ली जाती है। बरगी में एक साधु बाबा की निर्मम हत्या कर दी जाती है। और इन सबके बीच शहर में रोजाना चाकूबाजी और मारपीट की घटनाएं जैसे आम बात हो गई हैं।
यह घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह उस भय और असुरक्षा का चेहरा हैं जिसमें आज जबलपुर का हर नागरिक जी रहा है। सवाल साफ है—आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो गए? क्या पुलिस का खौफ खत्म हो चुका है?
कप्तान साहब, यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के भरोसे पर सीधा हमला है। लोग पूछ रहे हैं कि जब शहर में दिनदहाड़े गोलियां चल रही हैं और हत्या जैसी घटनाएं आम हो रही हैं, तो क्या इसे सुशासन कहा जा सकता है?
सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की है कि जनप्रतिनिधियों की ओर से भी इस पर कोई ठोस आवाज नहीं उठ रही। पूरा शहर सहमा हुआ है और जिम्मेदार लोग खामोश हैं।
कप्तान साहब, शहर की जनता अब आपसे जवाब मांग रही है। यह चर्चा भी जोरों पर है कि आप मैदान में कम और दफ्तरों में ज्यादा नजर आते हैं। बैठकों और निरीक्षणों तक सीमित रहकर क्या अपराध पर नियंत्रण पाया जा सकता है? जनता को सड़क पर पुलिस की मौजूदगी चाहिए, न कि सिर्फ फाइलों में कार्रवाई।
थानों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। कई थानेदार अपने चेंबर तक सीमित हैं, क्षेत्र की जनता उन्हें पहचानती तक नहीं। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस का असर कहीं नजर नहीं आ रहा। यह भी आरोप लग रहे हैं कि कई थानों में पदस्थापना सिफारिश और पहुंच के आधार पर हुई है, जिससे जवाबदेही खत्म होती जा रही है।
आम लोगों की बात तो दूर, क्षेत्र के विशिष्ट और जिम्मेदार नागरिकों तक को पहचानने में असमर्थता पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है। इससे यह साफ झलकता है कि पुलिस और समाज के बीच का संवाद कमजोर पड़ता जा रहा है।
कभी पुलिस और जनता के बीच जो भरोसे का रिश्ता होता था, वह अब धीरे-धीरे खत्म होता दिखाई दे रहा है। सामाजिक सरोकारों से दूरी का सीधा असर कानून-व्यवस्था पर पड़ता है, क्योंकि स्थानीय स्तर की जानकारी और सहयोग के बिना अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं हो पाता।
अब वक्त आ गया है कि आप सख्त फैसले लें। अपने अधीनस्थ अधिकारियों में अनुशासन और जवाबदेही तय करें। थानों को मैदान में उतारें, ताकि अपराधियों में पुलिस का डर फिर से कायम हो सके।
क्योंकि अगर अब भी हालात नहीं संभले, तो सिर्फ अपराध ही नहीं बढ़ेंगे—बल्कि पुलिस से जनता का भरोसा भी पूरी तरह टूट जाएगा।
