जबलपुर। मध्यप्रदेश कांग्रेस इस समय संगठन सृजन अभियान के जरिए नए कार्यकर्ताओं को जोड़ने, युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने और बूथ स्तर पर पार्टी को मजबूत करने की कवायद में जुटी हुई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी लगातार संगठन में नई ऊर्जा भरने की बात कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल का प्रदेशभर में चल रहा दौरा राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रहा है।
तीन दिन के जबलपुर प्रवास के दौरान अजय सिंह राहुल ने शहर और ग्रामीण क्षेत्र के आधा सैकड़ा से अधिक नेताओं के घर जाकर मुलाकात की। उनके आने-जाने से कई इलाकों में राजनीतिक हलचल जरूर दिखाई दी, लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना रहा कि इन मुलाकातों से आखिर पार्टी को क्या राजनीतिक लाभ मिलने वाला है।
पुराने रिश्तों की धूल झाड़ने की कोशिश?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अजय सिंह राहुल का यह दौरा केवल औपचारिक संगठनात्मक संवाद नहीं था। प्रदेश के कई शहरों की तरह जबलपुर में भी उन्होंने उन नेताओं से संपर्क साधा, जो कभी स्वर्गीय अर्जुन सिंह के करीबी माने जाते थे, लेकिन अब सक्रिय राजनीति में उनका प्रभाव सीमित रह गया है।
इनमें से कई चेहरे ऐसे हैं जिन्हें जनता चुनावों में लगातार नकार चुकी है। बावजूद इसके, उन्हीं नेताओं के घरों पर बैठकों और चर्चाओं का सिलसिला चलता रहा। इससे पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि नेता जी अपने पुराने राजनीतिक नेटवर्क को फिर सक्रिय करने की कोशिश में हैं।
क्या हाईकमान को संदेश देने की कवायद?
कांग्रेस के भीतर चर्चा इस बात की भी है कि यह पूरा दौरा कहीं न कहीं पार्टी हाईकमान को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, लगातार पुराने समर्थकों और वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि आज भी प्रदेश में उनका एक अलग प्रभाव और समर्थक समूह मौजूद है।
हालांकि सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या केवल पुराने चेहरों की भीड़ जुटा लेने से राजनीतिक प्रासंगिकता साबित हो सकती है? वर्तमान दौर में राजनीति का केंद्र युवा मतदाता, जमीनी संघर्ष और संगठनात्मक सक्रियता बन चुका है। ऐसे में बंद कमरों की बैठकों और पुराने समीकरणों की राजनीति कितनी प्रभावी साबित होगी, इसे लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी संशय दिखाई दे रहा है।
स्थानीय कांग्रेस नेताओं में असहजता
जबलपुर दौरे के दौरान कांग्रेस के वर्तमान पदाधिकारियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच भी असहजता साफ दिखाई दी। कई नेताओं को यह समझ नहीं आया कि यह यात्रा संगठन मजबूत करने के लिए है या पुराने गुटों को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि पार्टी वास्तव में नए नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहती है तो उसे उन चेहरों को अवसर देना होगा जो जनता के बीच सक्रिय हैं। लेकिन जब हर बैठक में वही पुराने और चुनाव हार चुके चेहरे दिखाई देते हैं, तो युवा कार्यकर्ताओं का उत्साह कमजोर पड़ता है।
जनता बदलाव चाहती है, विरासत नहीं
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस पहले ही लगातार चुनावी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में पार्टी को मजबूत जमीनी रणनीति, आक्रामक जनसंपर्क और विश्वसनीय नेतृत्व की जरूरत है।
जनता अब केवल राजनीतिक विरासत के नाम पर नेतृत्व स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखाई देती। मतदाता ऐसे नेताओं को देखना चाहता है जो सड़क पर संघर्ष करें, स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय रहें और संगठन को नई दिशा दें।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा जहां बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में लगी हुई है, वहीं कांग्रेस अब भी गुटबाजी, पुराने शक्ति केंद्रों और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के जाल में उलझी नजर आती है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर ही यह सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस भविष्य की राजनीति की ओर बढ़ रही है या फिर अतीत के सहारे अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का साफ मानना है कि यदि कांग्रेस को प्रदेश में पुनर्जीवन चाहिए तो उसे केवल पुराने “फ्यूज बल्बों” की झालर सजाने के बजाय नए दीपक जलाने होंगे। नए चेहरों, सक्रिय कार्यकर्ताओं और जमीनी नेतृत्व को आगे लाए बिना पार्टी का भविष्य मजबूत होना मुश्किल दिखाई देता है।
