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क्या, विश्नोई की विदाई की है तैयारी ! मोहन सरकार नहीं सुनती बात

 

जबलपुर। पाटन विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री अजय बिश्नोई ने पिछले दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बार फिर जनता की तकलीफों से जुड़ा अपना दर्द खुलकर बयां किया। अपनी बेबाकी और मुखर अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले बिश्नोई की पोस्ट को लेकर जहां एक वर्ग उनके समर्थन में नजर आया, वहीं सरकार की ओर से अपेक्षित तवज्जो नहीं मिलने को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।


दरअसल, पाटन क्षेत्र की जनता लंबे समय से आवागमन और सड़क व्यवस्था से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रही है। शहपुरा में राष्ट्रीय राजमार्ग पर बने पुल के एक हिस्से को नुकसान पहुंचने के बाद यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई और भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग निर्धारित किए जाने से पाटन क्षेत्र की सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ गया। इसके चलते सड़क दुर्घटनाओं और सड़क खराब होने जैसी समस्याओं को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

इसी मुद्दे को लेकर अजय बिश्नोई ने अपनी बात सोशल मीडिया के माध्यम से रखी। खास बात यह रही कि इस बार उनकी पोस्ट में लोक निर्माण विभाग को लेकर भी सवाल और टिप्पणी सामने आई। सरकारी विभाग में ठेकेदार से रिश्वत लेने की बात को भी उन्होंने प्रमुखता से रखा। राजनीतिक जानकार लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के साथ बढ़ती दूरी या राजनीतिक संबंधों में खटास के संकेत के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि, इस संबंध में दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक जोर - आजमाइश कोई नई बात नहीं है।

बिश्नोई की नाराजगी का यह पहला मामला नहीं है। वे समय-समय पर अपनी ही सरकार और प्रशासन के सामने जनता से जुड़े मुद्दों को मुखरता से उठाते रहे हैं। यही बेबाकी उनकी राजनीतिक पहचान भी मानी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि जब सत्तारूढ़ दल का एक वरिष्ठ और निर्वाचित विधायक लगातार जनता की समस्याएं उठा रहा हो, तो क्या सरकार उसकी आवाज को पर्याप्त महत्व दे रही है?

इसी बीच राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। भाजपा की राजनीति में पुराने और प्रभावशाली नेताओं की भूमिका को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, नरोत्तम मिश्रा, गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के राजनीतिक सफर में आए बदलावों का हवाला देते हुए अब कुछ लोग अजय बिश्नोई के भविष्य को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।

बिश्नोई अपनी मुखर राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते हैं और लंबे समय से सक्रिय राजनीति में हैं। ऐसे में उनकी बातों को सरकार और संगठन की ओर से कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है, यह आने वाले समय में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल 2028 के विधानसभा चुनाव को लेकर है। क्या भाजपा अजय बिश्नोई को एक बार फिर पाटन से मैदान में उतारेगी? क्या पार्टी उन्हें संगठन में कोई नई जिम्मेदारी दे सकती है? या फिर उनकी चुनावी राजनीति से विदाई की चर्चाएं वास्तव में किसी बड़े राजनीतिक संकेत की ओर इशारा कर रही हैं?

फिलहाल इसे लेकर कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है। इसलिए टिकट को लेकर चल रही चर्चाओं को फिलहाल राजनीतिक अटकलों से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन बिश्नोई की मुखरता और सरकार के साथ उनके मुद्दों को लेकर सामने आने वाली तल्खी ने इन चर्चाओं को जरूर हवा दे दी है। जिस तरह से बिश्नोई को सरकार में अनसुना किया जा रहा है? क्या यह किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है? या फिर उनके बयान का संदर्भ कुछ और है? आने वाला समय इन सवालों का जवाब देगा।
आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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